राज्यसभा चुनाव 2026: विपक्ष से पहले अपने सहयोगियों से जूझता एनडीए

पश्चिम बंगाल में TMC अपनी चारों सीटें बचाने की स्थिति में
CPI (M ) की एक सीट पर खतरा और बीजेपी यहां तलाश रही अवसर

न्यूज़ बॉक्स संवाददाता
नयी दिल्ली :उच्च सदन यानी राज्यसभा की 37 सीटों पर चुनाव आयोग ने चुनाव का ऐलान कर दिया है और तय कार्यक्रम के मुताबिक 16 मार्च को मतदान होगा। इस ऐलान के साथ ही सियासी हलचल तेज हो गई है, क्योंकि यह चुनाव केवल सत्ता और विपक्ष के बीच का मुकाबला नहीं, बल्कि गठबंधन के भीतर संतुलन की भी बड़ी परीक्षा बनता दिख रहा है। इन 37 सीटों में से 25 सीटें फिलहाल इंडिया ब्लॉक के पास हैं, जबकि 12 सीटें एनडीए के खाते में हैं। ऐसे में एनडीए के लिए यह बढ़त बनाने का सुनहरा मौका है, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती अपने सहयोगियों को साधने की बनती नजर आ रही है।

सबसे पहले उन प्रमुख चेहरों पर नजर डालना जरूरी है, जिनका कार्यकाल समाप्त हो रहा है। महाराष्ट्र में शरदचंद्र गोविंदराव पवार, प्रियंका विक्रम चतुर्वेदी और रामदास अठावले जैसे बड़े नेताओं का कार्यकाल खत्म हो रहा है। तमिलनाडु में एम थंबीदुरई, तिरुचि शिव और डॉ. कनिमोझी, एनवीएन सोमू जैसे प्रमुख चेहरे इस बार राज्यसभा से बाहर होंगे। पश्चिम बंगाल में साकेत गोखले, विकास रंजन भट्टाचार्य और सुब्रत बख्शी का कार्यकाल समाप्त हो रहा है, जबकि एक सीट पहले से ही रिक्त है। बिहार में उपेंद्र कुशवाहा, रामनाथ ठाकुर और हरिवंश नारायण सिंह जैसे नेताओं का कार्यकाल खत्म हो रहा है, जिससे मुकाबला और दिलचस्प हो गया है।

अगर राज्यों के गणित को विस्तार से समझें, तो सबसे जटिल स्थिति बिहार में दिखाई देती है। यहां पांच सीटों पर चुनाव होना है। एनडीए के पास 202 विधायक हैं, जबकि पांचों सीटें जीतने के लिए 205 वोटों की जरूरत है, यानी एनडीए को तीन वोटों की कमी है। एक सीट जीतने के लिए 41 वोट आवश्यक हैं। दूसरी ओर महागठबंधन के पास 35 विधायक हैं और यदि AIMIM के 5 और BSP का 1 विधायक साथ आ जाते हैं, तो विपक्ष एक सीट निकाल सकता है। एनडीए के भीतर सीट बंटवारे का फॉर्मूला लगभग तय माना जा रहा है, जिसमें दो सीटें बीजेपी, दो जेडीयू और एक सीट किसी सहयोगी दल को दी जा सकती है, लेकिन यही सहयोगी कौन होगा, यह सबसे बड़ा सवाल है। लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) इस दौड़ में आगे मानी जा रही है और चर्चा है कि चिराग पासवान अपनी मां को राज्यसभा भेज सकते हैं। वहीं हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा और राष्ट्रीय लोक मोर्चा भी दावेदारी में हैं। खासकर उपेंद्र कुशवाहा की स्थिति कमजोर बताई जा रही है, क्योंकि उनकी पार्टी के कुछ विधायक नाराज हैं। ऐसे में बिहार में यह चुनाव विपक्ष बनाम सत्ता से ज्यादा एनडीए के अंदरूनी समीकरणों की परीक्षा बन गया है।

महाराष्ट्र में कुल सात सीटें खाली हो रही हैं और 288 सदस्यीय विधानसभा में एक सीट जीतने के लिए 37 वोटों की आवश्यकता होती है। सत्तारूढ़ महायुति के पास 235 विधायक हैं, जिससे वह छह सीटें आसानी से जीत सकती है। हालांकि, राजनीतिक स्थिति उतनी सरल नहीं है जितनी गणित में दिखती है। शिवसेना (शिंदे गुट) दो सीटों की मांग कर रही है, जबकि बीजेपी तीन सीटें अपने पास रखकर एक सीट आरपीआई (अठावले गुट) को देने के विकल्प पर विचार कर सकती है। यदि बीजेपी चार उम्मीदवार उतारती है और शरदचंद्र गोविंदराव पवार निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरते हैं, तो क्रॉस-वोटिंग की संभावना भी बन सकती है। ऐसे में महाराष्ट्र में यह चुनाव केवल सीटों का नहीं, बल्कि गठबंधन के भीतर भरोसे और नियंत्रण की परीक्षा बन गया है।

दक्षिण भारत में तमिलनाडु की छह सीटों पर चुनाव होना है, जिनमें से चार सीटें डीएमके, एक एआईएडीएमके और एक अन्य दल के पास है। मौजूदा विधानसभा गणित के आधार पर डीएमके चार सीटें आसानी से जीत सकता है और एआईएडीएमके अपनी एक सीट बचा सकता है, जबकि एक सीट पर मुकाबला संभव है। पश्चिम बंगाल में पांच सीटों में से चार तृणमूल कांग्रेस और एक सीट सीपीआई (एम) के पास है। यहां तृणमूल कांग्रेस अपनी चारों सीटें बचाने की स्थिति में है, लेकिन सीपीआई (एम) की सीट पर खतरा मंडरा रहा है और बीजेपी यहां अवसर तलाश रही है।

ओडिशा में चार सीटों में से दो बीजेपी और दो बीजेडी के पास हैं, लेकिन मौजूदा समीकरणों के अनुसार बीजेपी तीन सीटें जीत सकती है और बीजेडी को एक सीट से संतोष करना पड़ सकता है। असम में तीन सीटों में से दो बीजेपी और एक एजीपी के पास है, लेकिन इस बार तीसरी सीट पर कांग्रेस और एआईयूडीएफ गठबंधन चुनौती पेश कर सकता है, जिससे एजीपी को नुकसान हो सकता है।

उत्तर और मध्य भारत के राज्यों में भी दिलचस्प बदलाव संभव हैं। हरियाणा में दो सीटों में से दोनों फिलहाल बीजेपी के पास हैं, लेकिन मौजूदा गणित के अनुसार एक सीट बीजेपी और एक कांग्रेस के खाते में जा सकती है। छत्तीसगढ़ में दोनों सीटें कांग्रेस के पास हैं, लेकिन इस बार एक-एक सीट दोनों दलों को मिल सकती है। तेलंगाना में दो सीटों में से एक कांग्रेस और एक बीआरएस के पास है, लेकिन मौजूदा स्थिति कांग्रेस को दोनों सीटों पर बढ़त देती दिख रही है। हिमाचल प्रदेश में एक सीट बीजेपी के पास है, लेकिन यहां कांग्रेस के पक्ष में झुकाव देखा जा रहा है, जिससे बीजेपी को नुकसान हो सकता है।

कुल मिलाकर देखें तो इन चुनावों में एनडीए को 2 से 3 सीटों का फायदा मिल सकता है, जबकि इंडिया ब्लॉक को 3 से 4 सीटों का नुकसान उठाना पड़ सकता है। बीजेपी की सीटें 9 से बढ़कर 12 तक पहुंच सकती हैं, जबकि कांग्रेस की सीटें 4 से बढ़कर 5 हो सकती हैं। इसके उलट आरजेडी, एनसीपी, शिवसेना (यूबीटी) और आरएलएम जैसे क्षेत्रीय दलों को नुकसान उठाना पड़ सकता है।

यह चुनाव केवल संसदीय प्रक्रिया नहीं, बल्कि राजनीतिक ताकत की असली परीक्षा है। अगर बीजेपी अपने सहयोगियों की महत्वाकांक्षाओं को संतुलित कर लेती है, तो राज्यसभा में उसकी बढ़त लगभग तय है। लेकिन अगर सीट बंटवारे को लेकर खींचतान बढ़ती है, तो यह चुनाव विपक्ष से पहले एनडीए की एकजुटता की परीक्षा बन जाएगा। यही वजह है कि इस बार असली लड़ाई बाहर से ज्यादा अंदर की है—और यही तय करेगी कि राज्यसभा में किसकी पकड़ मजबूत होगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *