लोकसभा में 10 साल बाद होगी नेता प्रतिपक्ष की बहाली !

संसदीय प्रणाली में नेता प्रतिपक्ष का पद काफी सम्मानजनक माना जाता है। यह पद कैबिनेट मंत्री के बराबर होता है। संसद में बहस एवं चर्चा के दौरान नेता प्रतिपक्ष को खास तरजीह दी जाती है। नेता प्रतिपक्ष बिना किसी नोटिस के सदन में अपनी बात रख सकते हैं।

लोकसभा चुनाव संपन्न होने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एक बार फिर से राजग (NDA) सरकार गठित हो गई और फिर तमाम मंत्रियों ने अपने मंत्रालयों और विभागों की जिम्मेदारी भी संभाल ली। अब बारी है लोकसभा में होने वाली पहली बैठक की।

इस बैठक में सभी की निगाहें लोकसभा में विपक्ष के नेता यानी नेता प्रतिपक्ष पर टिकी रहेंगी कि आखिर इस बार यह जिम्मेदारी कौन संभालता है, क्योंकि नियमों के मुताबिक, पिछले 10 साल से यह पद खाली था।

कैसे होता है विपक्ष के नेता का चयन?

10 फीसदी सीट जीतने वाली पार्टी अपने किसी एक नेता को सर्वसम्मति से अपना नेता चुनती है, जिसे लोकसभा में विपक्षी नेता या नेता प्रतिपक्ष कहा जाता है। 

पहला LoP कौन था?

देश में 1951 में पहली बार लोकसभा चुनाव हुआ था, लेकिन 1951 में नेता प्रतिपक्ष नहीं था। 1969 में पहली बार किसी नेता को आधिकारिक नेता प्रतिपक्ष के तौर पर मान्यता दी गई थी। लोकसभा के पहले नेता प्रतिपक्ष कांग्रेस (ओ) के राम सुभाग सिंह थे।

लोकसभा चुनाव 2024 कांग्रेस पार्टी के लिए कई तरीके से फायदेमंद रहा है। इस चुनाव में उसकी सीटें करीब दोगुनी हुई हैं, इस बार उसे नेता प्रतिपक्ष (LoP) का औपचारिक दर्जा मिलने का रास्ता भी साफ हो गया है। कांग्रेस कार्यसमिति ने इस पद के लिए राहुल गांधी का चुनाव करते हुए प्रस्ताव पारित किया है। राहुल यदि इस प्रस्ताव को यदि स्वीकार कर लेते हैं तो वे लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष होंगे। इस चुनाव में कांग्रेस को 99 सीटों पर जीत मिली है लेकिन एक निर्दलीय सांसद के उसके साथ आने से उसके सदस्यों की संख्या 100 हो गई है। नेता प्रतिपक्ष संसद की कई महत्वपूर्ण समितियों का सदस्य होता है। इसके अलावा लोकतांत्रिक संस्थाओं के मुखिया के चयन में उसकी भागीदारी रहती है। सीबीआई, सीवीसी, सीआईसी, चुनाव आयोग और एनएचआरसी प्रमुख के चुनाव में नेता प्रतिपक्ष चयन समिति के सदस्य होते हैं। इस चयन समिति में प्रधानमंत्री के साथ एलओपी को भी रखा जाता है। इसके अलावा लोक लेखा समिति के अध्यक्ष का पद भी आम तौर पर नेता प्रतिपक्ष को दिया जाता है। पीएसी के पास पीएम को भी तलब करने का अधिकार होता है। बड़े सरकारी आयोजनों में एलओपी को उपस्थिति भी जरूरी होती है।

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