टीएमसी नेता मुकुल राय की विधानसभा सदस्यता रद्द

हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला,दलबदल विरोधी कानून के तहत कार्रवाई

न्यूज़ बॉक्स संवाददाता
कोलकाता: पश्चिम बंगाल के दिग्गज नेता मुकुल रॉय को कलकत्ता हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। कलकत्ता हाई कोर्ट ने गुरुवार को दलबदल विरोधी कानून के तहत ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए तृणमूल कांग्रेस के नेता मुकुल राय की बंगाल विधानसभा की सदस्यता रद कर दी। । मुकुल रॉय बीजेपी से जीतने के बाद टीएमसी में चले गए थे। इसके बाद से उनकी सदस्यता का मामला कानूनी दांवपेच में फंस गया था। कलकत्ता हाईकोर्ट ने दलबदल विरोधी कानून के तहत मुकुल रॉय की पश्चिम बंगाल विधानसभा सदस्यता रद्द कर दी है। रॉय 2021 में भाजपा के टिकट पर जीते थे, लेकिन बाद में टीएमसी में शामिल हो गए थे। हाई कोर्ट के न्यायाधीश देबांग्शु बसाक और जस्टिस मोहम्मद शब्बर रशीदी की खंडपीठ ने विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी और भाजपा विधायक अंबिका राय की याचिकाओं पर यह फैसला दिया।
यह देश में अपनी तरह का पहला मामला है, जब किसी कोर्ट ने दलबदल विरोधी कानून के तहत किसी की विधानसभा की सदस्यता रद कर दी है। हाई कोर्ट मुकुल को लेकर विधानसभा अध्यक्ष बिमान बनर्जी के फैसले को भी खारिज कर दिया है। नियम के तहत सीट पर कोई उपचुनाव नहीं होगा। क्योंकि, 2026 में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं।
71 साल के मुकुल रॉय कृष्णानगर उत्तर से विधायक थे। वह लगातार तीसरी बार यहां से चुने गए थे। मुकुल रॉय पहली बार यहां से 2011 में जीते थे। इसके बाद वह 2016 में फिर से टीएमसी के विधायक बने थे, हालांकि 2021 के चुनावों में वह बीजेपी से लड़े थे। इसमें वह जीतने में सफल रहे थे लेकिन वह फिर टीएमसी में चले गए थे। इसके बाद वह दल-बदल कानून के दायरे में आ गए थे। मुकुल रॉय ने तब बीजेपी कैंडिडेट के तौर पर टीएमसी की उम्मीदवार कौशानी मुखर्जी को हराया था।
गौरतलब है की भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी ने पहले दलबदल कानून के तहत मुकुल का विधायक पद रद करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाई कोर्ट में याचिका दायर करने को कहा। इसके बाद सुवेंदु ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अलग से भाजपा विधायक अंबिका राय ने भी मुकुल के खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका दायर की।अपने फैसले में खंडपीठ ने कहा कि विधानसभा अध्यक्ष का यह फैसला कि इस मामले में सौ प्रतिशत सुबूत चाहिए, सही नहीं है। कोर्ट ने कहा कि अगर शिकायत करने वाला कोई सुबूत देता है, अगर विरोधी उससे इन्कार नहीं करता है, तो उसे मान लिया जाता है। इस मामले में भी यही हुआ।मुकुल ने उन सुबूतों से इन्कार नहीं किया जो सुवेंदु ने मुकुल के खिलाफ उठाए थे। हालांकि तब मुकुल ने दलील दी कि वह मानसिक रूप से तनाव में थे क्योंकि उस समय उनकी पत्नी बीमार थीं।
सुवेंदु ने फैसले का किया स्वागत
सुवेंदु ने हाई कोर्ट के फैसले को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि देर से ही सही, लेकिन सच्चाई की जीत हुई है। वहीं विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि मैंने मामले की प्रकृति के अनुसार फैसला दिया था। मैं कोर्ट के फैसले की कापी देखूंगा। उसके बाद ही अगला निर्णय लिया जाएगा।
क्या है दलबदल विरोधी कानून ?
दलबदल विरोधी कानून एक ऐसा कानून है जो संसद सदस्यों और विधायकों को अपनी पार्टी छोडक़र दूसरी पार्टी में शामिल होने से रोकता है, ताकि राजनीतिक स्थिरता बनी रहे। यह कानून 1985 में संविधान की 10वीं अनुसूची के रूप में 52वें संशोधन अधिनियम द्वारा लाया गया था। इस कानून के तहत, दलबदल करने वाले सदस्यों को अयोग्य घोषित किया जा सकता है।
संविधान की दसवीं अनुसूची में कहा गया है कि किसी भी राजनीतिक दल से संबंधित सदन का कोई सदस्य अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा यदि उसने स्वेच्छा से उस राजनीतिक दल की सदस्यता त्याग दी हो, या उस राजनीतिक दल द्वारा जारी किसी निर्देश के विरुद्ध उस सदन में मतदान किया हो या मतदान से परहेज किया हो। दलबदल पर निर्णय लेने का दायित्व अध्यक्ष का है और निर्णय लेने की कोई समय-सीमा नहीं है।

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