नतीजों पर पड़ेगा जातीय समीकरण को साधने का असर
लालू फैक्टर को भी नहीं किया जा सकता दरकिनार

न्यूज़ बॉक्स संवाददाता
पटना :बिहार में विधानसभा चुनाव के नतीजों का काउंट डाउन शुरू हो गया है।बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की मतगणना 14 नवंबर को सुबह 8 बजे से शुरू हो गई। पहले रुझान सुबह साढ़े 8 बजे आने की संभावना है, और दोपहर तक तस्वीर लगभग साफ हो जाएगी। इस बार पोस्टल बैलेट की गिनती का तरीका बदल गया है, जिससे आखिरी दो राउंड की गिनती से पहले पोस्टल वोट शामिल किए जाएंगे। सभी नतीजे शाम तक घोषित किए जाने की उम्मीद है।
राज्य में इस बार कुल 66.91% मतदान हुआ, जिसमें पुरुष मतदाता 62.8% और महिला मतदाता 71.6% ने वोट डाला। चुनाव आयोग ने बताया कि यह 1951 के बाद सबसे उच्च मतदान प्रतिशत है। दो चरणों के चुनाव में 8.5 लाख से अधिक पोलिंग कर्मचारी और 2,616 उम्मीदवारों द्वारा नियुक्त 1.4 लाख से ज्यादा पोलिंग एजेंट, 243 जनरल ऑब्ज़र्वर और 38 पुलिस ऑब्ज़र्वर शामिल रहे।
NDA हो या महागठबंधन दोनों ही खेमों की स्थिति- यही रात अंतिम, यही रात भारी वाली होगी। इस पूरे चुनाव में कई फैक्टर ऐसे रहे हैं, जिनकी चर्चा खूब हुई, जैसे क्या महिलाओं का झुकाव NDA की तरफ और युवा वोटरों का समर्थन तेजस्वी यादव और महागठबंधन की तरफ। हालांकि, इसमें एक बड़ा फैक्टर है जाति यानी कास्ट और उसे में साधने में लालू प्रसाद यादव ने बड़ी ही अहम भूमिका निभाई है।
चारा घोटाले में दोषी ठहराए जाने के बाद चुनाव लड़ने पर रोक लगने के बावजूद लालू प्रसाद यादव अपनी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के जरिए बिहार की राजनीति पर काफी प्रभाव डाल रहे हैं। RJD ने यादव और मुस्लिम वोट बैंक पर मजबूत पकड़ बनाए रखी है, जो परंपरागत रूप से लालू के राजनीतिक आधार की रीढ़ है, जिससे यह चुनावी गणित में एक अहम कारक बन गया है।सामाजिक न्याय और पिछड़ी जातियों के सशक्तिकरण की लालू की राजनीतिक विरासत ग्रामीण बिहार में मजबूती से गूंजती रही है, जिससे खासतौर से निम्न आय और हाशिए पर पड़े समूहों के बीच मतदाताओं की पसंद प्रभावित हो सकती है।इसलिए उन्होंने मल्लाह जाति की राजनीति करने वाली VIP पार्टी को अपने साथ रखकर EBC वर्ग के मतदाताओं को भी महागठबंधन के मजबूत स्तंभ के रूप में शामिल किया, जो चुनाव के परिणामों पर गहरा असर डाल सकता है।
NDA ने ‘जंगलराज’ का मुद्दा जोर-शोर से प्रचारित किया, लेकिन जैसे ही महागठबंधन ने तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाया, जनता के मन में यह डर घर करने लगा कि अगर तेजस्वी मुख्यमंत्री बने तो पुराना ‘जंगलराज’ लौट सकता है, क्योंकि वे लालू यादव के पुत्र हैं।लालू यादव ने यादव समुदाय के वोटों को एकजुट करने के लिए ही तेजस्वी को सीएम कैंडिडेट बनवाया, जो एक राजनीतिक चाल थी, लेकिन इसके साथ ही यह भी पता था कि इसका उलटा असर भी हो सकता है। यही कारण था कि कांग्रेस चुनावों से पहले मुख्यमंत्री चेहरे की घोषणा नहीं चाहती थी, ताकि इस दांव का विपक्ष पर नकारात्मक असर कम से कम हो।
इस चुनाव में अंतरराष्ट्रीय निगरानी भी रही। 6 देशों के 16 प्रतिनिधि इंटरनेशनल इलेक्शन विज़िटर्स प्रोग्राम के तहत बिहार की चुनाव प्रक्रिया देखने आए, और उन्होंने इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यवस्थित, पारदर्शी और कुशल चुनाव बताया।